Two tea plants were presented. After that Robert Bussaheb discovered tea in Assam.

Two tea plants were presented. After that Robert Bussaheb discovered tea in Assam.

चाय के दो पौधे भेंट किए थे। उसके बाद रॉबर्ट बुस साहब ने असम में चाय की खोज की। इस काम में असम के प्रथम चाय कृषक मणिराम देवान ने भी उनकी मदद की थी। इस तरह रॉबर्ट बुस साहब की खोज से ही असम में चाय की खेती का श्रीगणेश हुआ था।”

 

पिताजी कहते गए- “1839 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ही पहली बार असम में चाय की खेती की शुरुआत की। इसके बाद भारत के अन्य राज्यों में भी चाय की खेती की शुरुआत धीरे-धीरे होने लगी। असम का पहला चाय बगीचा है- चाबुवा चाय बगीचा”। इसी बीच रोहन फिर बोल उठा- “पिताजी, ये वही मणिराम देवान है न, जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अपना जीवन न्यौछावर किया था ?” हाँ हाँ, वे ही हैं। ये हमारे असम के प्रथम चाय कृषक ही नहीं, बल्कि देशप्रेमी भी थे। उन्होंने 1853 ई. में असम में दो चाय बगीचे स्थापित किए थे- पहला चिनामारा चाय बगीचा और दूसरा चेलेंग चाय बगीचा। इन दोनों बगीचों के कारण वे एक मशहूर चाय कृषक के रूप में जाने जाते हैं।”

 

इतने में ड्राइवर ने गाड़ी फिर रोक दी, क्योंकि दोनों को बहुत भूख लगी थी। इस समय

 

दिन के 2 बज रहे थे। सबने भोजन किया। गाड़ी ने फिर गति लो। पिताजी फिर बोलने लगे- “हमारे असम में छोटे-बड़े कई चाय बगीचे हैं। 2001 ई. के आँकड़ों के अनुसार हमारे असम में लगभग ढाई हजार छोटे चाय बगीचे हैं। ज्यादातर चाय

 

के बगीचे ऊपरी असम में स्थित हैं।”

 

पिताजी और कुछ कहना चाहते थे कि रोहन बीच में ही बोल उठा- “पिताजी, लोग चाय क्यों पीते हैं ? क्या इसकी कोई उपयोगिता है ?” “हाँ, क्यों नहीं ?” पिताजी ने उत्तर दिया “साधारणतः लोग शरीर एवं मन में ताजगी लाने के लिए चाय पीते हैं। इसके साथ-साथ और भी कई वजहें हैं, जिनके कारण लोग चाय पीते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार चाय पीने से फेफड़ों के रोग, कैंसर, हैजा, टाइफाइड आदि रोग होने की संभावना कम होती है।”

 

पिताजी ने आगे कहा- “भारतवर्ष के ज्यादातर लोग चाय पीते हैं और विश्व में भी इसकी बहुत माँग है। जिन देशों के पास चाय नहीं है, वे अन्य देशों से इसका आयात करते हैं। विश्व में सबसे ज्यादा चाय असम में ही होती है, क्योंकि यहाँ की मिट्टी चाय खेती के लिए बहुत उपयोगी है। असम की चाय की विश्व बाजार में एक अलग पहचान है। कहा जाता है कि चाय के कारण ही अंग्रेजों ने असम में पहली बार 1885 ई. में रेलगाड़ी चलाने की व्यवस्था की थी। इस तरह देखा जाता है कि हमारा असम चाय के लिए ही आज विश्व में प्रसिद्ध है।”

 

ऐसे ही गपशप करते करते थे लोग शिवसागर पहुँच गए।”

 

चाय के दो पौधे भेंट किए थे। उसके बाद रॉबर्ट बुस साहब ने असम में चाय की खोज की। इस काम में असम के प्रथम चाय कृषक मणिराम देवान ने भी उनकी मदद की थी। इस तरह रॉबर्ट बुस साहब की खोज से ही असम में चाय की खेती का श्रीगणेश हुआ था।”

 

पिताजी कहते गए- “1839 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ही पहली बार असम में चाय की खेती की शुरुआत की। इसके बाद भारत के अन्य राज्यों में भी चाय की खेती की शुरुआत धीरे-धीरे होने लगी। असम का पहला चाय बगीचा है- चाबुवा चाय बगीचा”। इसी बीच रोहन फिर बोल उठा- “पिताजी, ये वही मणिराम देवान है न, जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अपना जीवन न्यौछावर किया था ?” हाँ हाँ, वे ही हैं। ये हमारे असम के प्रथम चाय कृषक ही नहीं, बल्कि देशप्रेमी भी थे। उन्होंने 1853 ई. में असम में दो चाय बगीचे स्थापित किए थे- पहला चिनामारा चाय बगीचा और दूसरा चेलेंग चाय बगीचा। इन दोनों बगीचों के कारण वे एक मशहूर चाय कृषक के रूप में जाने जाते हैं।”

 

इतने में ड्राइवर ने गाड़ी फिर रोक दी, क्योंकि दोनों को बहुत भूख लगी थी। इस समय

 

दिन के 2 बज रहे थे। सबने भोजन किया। गाड़ी ने फिर गति लो। पिताजी फिर बोलने लगे- “हमारे असम में छोटे-बड़े कई चाय बगीचे हैं। 2001 ई. के आँकड़ों के अनुसार हमारे असम में लगभग ढाई हजार छोटे चाय बगीचे हैं। ज्यादातर चाय

 

के बगीचे ऊपरी असम में स्थित हैं।”

 

पिताजी और कुछ कहना चाहते थे कि रोहन बीच में ही बोल उठा- “पिताजी, लोग चाय क्यों पीते हैं ? क्या इसकी कोई उपयोगिता है ?” “हाँ, क्यों नहीं ?” पिताजी ने उत्तर दिया “साधारणतः लोग शरीर एवं मन में ताजगी लाने के लिए चाय पीते हैं। इसके साथ-साथ और भी कई वजहें हैं, जिनके कारण लोग चाय पीते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार चाय पीने से फेफड़ों के रोग, कैंसर, हैजा, टाइफाइड आदि रोग होने की संभावना कम होती है।”

 

पिताजी ने आगे कहा- “भारतवर्ष के ज्यादातर लोग चाय पीते हैं और विश्व में भी इसकी बहुत माँग है। जिन देशों के पास चाय नहीं है, वे अन्य देशों से इसका आयात करते हैं। विश्व में सबसे ज्यादा चाय असम में ही होती है, क्योंकि यहाँ की मिट्टी चाय खेती के लिए बहुत उपयोगी है। असम की चाय की विश्व बाजार में एक अलग पहचान है। कहा जाता है कि चाय के कारण ही अंग्रेजों ने असम में पहली बार 1885 ई. में रेलगाड़ी चलाने की व्यवस्था की थी। इस तरह देखा जाता है कि हमारा असम चाय के लिए ही आज विश्व में प्रसिद्ध है।”

 

ऐसे ही गपशप करते करते थे लोग शिवसागर पहुँच गए।”

चाय के दो पौधे भेंट किए थे। उसके बाद रॉबर्ट बुस साहब ने असम में चाय की खोज की। इस काम में असम के प्रथम चाय कृषक मणिराम देवान ने भी उनकी मदद की थी। इस तरह रॉबर्ट बुस साहब की खोज से ही असम में चाय की खेती का श्रीगणेश हुआ था।”

पिताजी कहते गए- “1839 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी ने ही पहली बार असम में चाय की खेती की शुरुआत की। इसके बाद भारत के अन्य राज्यों में भी चाय की खेती की शुरुआत धीरे-धीरे होने लगी। असम का पहला चाय बगीचा है- चाबुवा चाय बगीचा”। इसी बीच रोहन फिर बोल उठा- “पिताजी, ये वही मणिराम देवान है न, जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अपना जीवन न्यौछावर किया था ?” हाँ हाँ, वे ही हैं। ये हमारे असम के प्रथम चाय कृषक ही नहीं, बल्कि देशप्रेमी भी थे। उन्होंने 1853 ई. में असम में दो चाय बगीचे स्थापित किए थे- पहला चिनामारा चाय बगीचा और दूसरा चेलेंग चाय बगीचा। इन दोनों बगीचों के कारण वे एक मशहूर चाय कृषक के रूप में जाने जाते हैं।”

इतने में ड्राइवर ने गाड़ी फिर रोक दी, क्योंकि दोनों को बहुत भूख लगी थी। इस समय

दिन के 2 बज रहे थे। सबने भोजन किया। गाड़ी ने फिर गति लो। पिताजी फिर बोलने लगे- “हमारे असम में छोटे-बड़े कई चाय बगीचे हैं। 2001 ई. के आँकड़ों के अनुसार हमारे असम में लगभग ढाई हजार छोटे चाय बगीचे हैं। ज्यादातर चाय

के बगीचे ऊपरी असम में स्थित हैं।”

पिताजी और कुछ कहना चाहते थे कि रोहन बीच में ही बोल उठा- “पिताजी, लोग चाय क्यों पीते हैं ? क्या इसकी कोई उपयोगिता है ?” “हाँ, क्यों नहीं ?” पिताजी ने उत्तर दिया “साधारणतः लोग शरीर एवं मन में ताजगी लाने के लिए चाय पीते हैं। इसके साथ-साथ और भी कई वजहें हैं, जिनके कारण लोग चाय पीते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार चाय पीने से फेफड़ों के रोग, कैंसर, हैजा, टाइफाइड आदि रोग होने की संभावना कम होती है।”

पिताजी ने आगे कहा- “भारतवर्ष के ज्यादातर लोग चाय पीते हैं और विश्व में भी इसकी बहुत माँग है। जिन देशों के पास चाय नहीं है, वे अन्य देशों से इसका आयात करते हैं। विश्व में सबसे ज्यादा चाय असम में ही होती है, क्योंकि यहाँ की मिट्टी चाय खेती के लिए बहुत उपयोगी है। असम की चाय की विश्व बाजार में एक अलग पहचान है। कहा जाता है कि चाय के कारण ही अंग्रेजों ने असम में पहली बार 1885 ई. में रेलगाड़ी चलाने की व्यवस्था की थी। इस तरह देखा जाता है कि हमारा असम चाय के लिए ही आज विश्व में प्रसिद्ध है।”

ऐसे ही गपशप करते करते थे लोग शिवसागर पहुँच गए।”¢

 

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